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बात कड़वी है पर एक राष्ट्रहित ऐसा भी है, जरा गौर से पढ़े

It is bitter, but a national interest is there,
It is bitter, but a national interest is there,

542चुने हुए सांसदों में से 233के खिलाफ देश के विभिन्न न्यायालयों में आपराधिक मामले चल रहे है जिसमे से 159के खिलाफ हत्या, बलात्कार, आतंकवाद व डकैती के गंभीर मामले दर्ज है।

पिछली बार की तुलना में 26%ऐसे सांसदों की संख्या बढ़ी है।

सोचने वाली बात यह है कि साफ छवि वालों की तुलना में ऐसे सांसदों के जीतने की संभावना 3गुना ज्यादा है।

याद करिये 2014में मोदीजी के भाषण को जब वो यह कह रहे थे कि संसद को दागियों से मुक्त करने के लिए सुप्रीम के साथ मिलकर फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर जल्द निर्णय करवाते हुए सफाई करेंगे मगर सबसे ज्यादा दागियों को टिकट देकर 2019 में संसद में खुद मोदीजी लेकर आये है।

542 सांसदों में से 475सांसद करोड़पति है।

करोड़पति प्रत्याशियों के जीतने की संभावना 37गुना ज्यादा होती है।सबसे ज्यादा करोड़पति सांसद गरीब चायवाले की पार्टी से जीते है।

खैर गरीब चायवाले ने भी चुनावी हलफनामे में अपनी संपत्ति करोड़ों में बताई है।

बाहुबल व धनबल के गठबंधन से सत्ता पर कब्जा किया गया है।
गरीब व संघर्षशील लोगों के लिए इस देश का लोकतंत्र सिर्फ ढोंग है।

आप सोच रहे होंगे कि ट्रोल सेना इतना हौंसला कहाँ से प्राप्त करती है? ये आंकड़ा आपको आईना बताता है।

हिन्दुराष्ट्र,हिंदुत्व,राष्ट्रहित के नाम पर जो जहर फैलाया गया उसको इन बाहुबलियों ने सरंक्षण दिया व इन करोड़पतियों ने फाइनेंस किया।

चाहे पक्ष के रहे है या विपक्ष के, लेकिन क्रिया-प्रतिक्रिया के माध्यम से इन्होंने मिलकर इसको आगे बढ़ाया और 18 से 25साल तक के युवाओं को अपने जाल में फंसाकर बर्बादी के मंजर में खड़ा करके खुद लोकतंत्र के वृद्धाश्रम में आशियाना बना लिया।

सोचिएगा खुद का भविष्य चुनने अर्थात शादी की उम्र 21 साल मगर देश का भविष्य चुनने के लिए उम्र 18साल!

कंप्यूटर क्रांति के दौर में शायद राजीव गांधी एकतरफा सोचकर मतदान की उम्र 18 साल कर दी होगी कि युवा देश का भविष्य है इसलिए इनकी भागीदारी लोकतंत्र में बढ़नी चाहिए मगर दूसरा पहलू नहीं सोचा गया कि जब पूंजीवाद का कब्जा देश पर होगा तो बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ को मजहबी उन्माद व फर्जी राष्ट्रवाद के नशे का आदि बनाकर देश की बर्बादी का हथियार बना दिया जायेगा।

किसी से दिया हक छीनना बड़ा मुश्किल है और आज के माहौल में यह सोचना भी पेचीदा है कि मतदान की उम्र 25 साल कर दी जाए मगर बैठकर विश्लेषण जरूर करना कि बाप खेत मे फाँसी के फंदे पर लटक रहा है, बड़ा भाई सीमा पर बलिदान दे रहा है और 22-23 साल का युवा हिंदुहित,राष्ट्रहित के फर्जीवाड़े का कट्टर सिपाही नजर आयेगा!

एक युवा (चे ग्वेरा) साम्राज्यवाद की दरिंदगी से बर्बाद होते गरीबों का दर्द देखकर अपने देश से निकलकर क्यूबा पहुंच जाता है और अमेरिका के सामने फिदेल कास्त्रो पैदा कर देता है मगर भगतसिंह के देश के करोड़ों युवाओं में से एक युवा भी 30 करोड़ गरीबों के दर्द से आक्रोशित नहीं हो पाता है।

प्रचंड बहुमत व भारी-भरकम भीड़ का हिस्सा बनकर कभी भी इस देश का कल्याण नहीं किया जा सकता।
सुधार व व्यवस्था परिवर्तन की क्रांति का आगाज सदा अल्पमत वाले ही करते आये है।

एथेंस की सड़कों पर एक गरीब मूर्तिकार का बेटा जनता को जगा रहा था।
यूनान के मजहबी उन्मादियों ने सत्ता के साथ मिलकर उसको रोकने की कोशिश की।
तथाकथित कानून के कठघरे में खड़ा किया।

उसके ऊपर आरोप लगाए गए..
1.कि यह नास्तिक है।
2.कि यह धार्मिक व्यवस्था व प्रतीकों पर सवाल खड़ा करता है इसलिए देशद्रोही है।
3.कि यह युवा पीढ़ी का दिमाग भ्रष्ट करता है

उस गरीब मूर्तिकार के बेटे को 221 बनाम 280 के बहुमत वाली न्यायिक व्यवस्था ने मृत्युदंड की सजा सुनाई।

जब क्रीटों ने हेमलॉक नामक विष का प्याला पिलाने के लिए आगे किया तब खुद को जस्टिफाई करने हेतु कहा कि आपको बहुमत का सम्मान करना चाहिए!

जवाब में उस गरीब मूर्तिकार के बेटे ने कहा “बहुमत एक भीड़ का नाम है जिसके पास विवेक नहीं होता, भीड़ मनमाने ढंग से काम करती है उससे मुझे कोई मतलब नहीं है।”

वो गरीब मूर्तिकार का बेटा यूनान का महान दार्शनिक सुकरात था जिसके शिष्य प्लूटो व आगे अरस्तू हुए और पूरी दुनियां उनको आज सम्मान की दृष्टि से देखती है और दुनियाँ के हर दर्शन-शास्त्र की किताब इनके बिना अधूरी रहती है।

जालिमों द्वारा षड्यंत्र रचकर भीड़ तो एकत्रित की जा सकती है मगर सुकरात बनने के लिए धारा के विपरीत विवेक से कार्य करना पड़ता है।

ये बाहुबलियों, धनबलियों, धार्मिक उन्मादियों की भीड़ है जिसने बहुमत तो हासिल कर लिया मगर देश दुनियाँ को आगे बढ़ाने के लिए दर्शन तो सुकरात की किताबों में ही ढूंढने पड़ेंगे और न ढूंढे तो बर्बादी का मंजर खुद ही बन जाएंगे !

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